इतिहास को अक्सर हम अंग्रेजों या मुगलों के खिलाफ लड़ी गई लड़ाइयों के चश्मे से देखते हैं, लेकिन यह उससे कहीं अधिक हजारों वर्षों से धर्म के नाम पर छिपी बुराइयों और परंपराओं के खिलाफ लड़ी गई कठिन लड़ाइयों का भी दस्तावेज है।
इतिहास केवल विजय और पराजय की गाथा नहीं, बल्कि यह जितना महान है, उतना ही क्रूर भी है, क्योंकि इसमें मानवता के लिए संघर्ष या अन्याय के खिलाफ लड़ाई भी शामिल हैं। हमें इतिहास की महानता की गाथा गाने या जाति पर गर्व करने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना उन धार्मिक बुराइयों और परंपराओं को फिर से जीवित करने का जोखिम पैदा करता है, जिनका स्रोत कुछ हद तक ब्राह्मणवाद रहा है।
जब हम इतिहास को गर्व के साथ देखते हैं, तो अनजाने में समानता की लड़ाई को कमजोर करते हैं। बहुजन महापुरुषों ने जो लड़ाइयां लड़ीं और जीतीं, वे फिर से हारी जा सकती हैं, और हम अपने भविष्य को एक बार फिर असमानता की खाई में धकेल सकते हैं।
वर्तमान पीढ़ी को आरएसएस की कुचक्र से बचकर, जाति और धर्म के नाम पर गर्व करने या इतिहास की महानता की गाथा गाने में अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय, हमें अपने वर्तमान और भविष्य को संवारने पर ध्यान देना चाहिए। अतीत में उलझने का अर्थ है कि हम वर्तमान को दफनाने के लिए समय बर्बाद कर रहे हैं। धर्म के जाल में फंसने के बजाय अधिकारों की लड़ाई लड़नी चाहिए और समानता की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। संविधान ही वह आधार है जो हमें समानता और उन्नति की ओर ले जाता है। इसके आगे कोई भी धर्म हो, वह संविधान के आगे कुछ भी नहीं, धर्म के नाम पर बंटवारा या गर्व हमें पीछे ले जाता है, जबकि संविधान हमें एकजुट करने और आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
Manoj Manav की कलम से…

