दलित, पिछड़े एवं आदिवासी वर्ग के युवाओं का गंभीर हालत अत्यधिक चिंताजनक, समाधान कैसे?

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ विविधता अपनी अनूठी पहचान रखती है, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक असमानता भी गहरी जड़ें जमाए हुए है। दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदाय, जो देश की आबादी का लगभग 85% हिस्सा हैं, आज भी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए हैं। इस पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण आरएसएस और मनुवाद की विचारधारा भी है, जो बहुजन वर्ग को कमजोर करने की एक सुनियोजित रणनीति के तहत काम कर रही है।

खास तौर पर आरएसएस और मनुवाद का उद्देश्य बहुजन वर्ग की संपत्ति और सत्ता को छीनकर उन्हें आर्थिक रूप से तंगहाल बनाना और इन समुदायों के बच्चों को मजदूरी और गरीबी में धकेलना है।

नीतियों को प्रभावित करके रोजगार और आर्थिक अवसरों को सीमित किया जा रहा है, जिसके चलते यह समुदाय गरीबी के चक्र में फंसकर फ्री राशन और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हो गए हैं। यह रणनीति उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखने का काम कर रही है।

शिक्षा को बहुजन वर्ग की प्रगति का आधार माना जाता है, लेकिन यहाँ भी मनुवादी विचारधारा इसे कमजोर करने में लगी हुई है। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति इस साजिश का जीवंत उदाहरण है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE) 2023-24 के अनुसार, राज्य के 80% सरकारी स्कूलों में पानी, शौचालय और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में 10,000 से अधिक स्कूल बंद या विलय किए गए हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा तक पहुँच बेहद मुश्किल हो गई है।

एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) 2024 के मुताबिक, सुविधाओं की कमी 5.5% तक दर्ज की गई है, जो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया पर गहरा असर डालती है। शिक्षकों की कमी और उनकी अनुपस्थिति इस समस्या को और गंभीर बनाती है। नतीजतन, बहुजन वर्ग के बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, जिससे उनकी भविष्य की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी उनका पिछड़ापन बना रहता है।

इसके साथ ही, आर्थिक कमजोरी बहुजन वर्ग को माइक्रो फाइनेंस की ओर धकेलती है, जो एक कर्ज के जाल के रूप में उनकी स्थिति को और बदतर बना देता है। उत्तर प्रदेश में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस नेटवर्क (MFIN) के आंकड़ों के अनुसार लोग माइक्रोफाइनेंस ऋण लेकर जीवन जीने पर मजबूर हो रहे हैं। और कर्ज चुकाने की मजबूरी ने लोगों को आर्थिक संकट में डाल दिया है। यह जाल बहुजन वर्ग और अधिक बेगारी की ओर ले जा रह है।

दूसरी ओर, पौष्टिक भोजन की कमी भी इस साजिश का एक अहम आयाम है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 5 साल से कम उम्र के 39.7% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण परिवारों के पास पर्याप्त पोषण वाला भोजन नहीं पहुँच पाता। मिड-डे मील और फ्री राशन जैसी योजनाएँ इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं कर सकती। कुपोषण के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है, जिसका बहुजन वर्ग की कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ रहा है।

आर्थिक तंगी, कर्ज का बोझ और शिक्षा की कमी के चलते बहुजन वर्ग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का शिकार हो रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में आत्महत्या की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, और मानसिक तनाव इसका प्रमुख कारण है।

ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण लोग मदद से वंचित रहते हैं, जिससे आत्महत्याओं और सड़क दुर्घटनाओं जैसे जोखिम भरे व्यवहारों में वृद्धि हो रही है। यह मानसिक कमजोरी बहुजन वर्ग को और असहाय बनाती है।

ऐसे में, जब बहुजन वर्ग इन समस्याओं से जूझता है, तो वह अक्सर धर्म का सहारा लेता है, लेकिन यहाँ भी मनुवाद और आरएसएस का नियंत्रण देखने को मिलता है! धर्म के नाम पर बहुजन वर्ग को गुमराह किया जाता है और उनकी वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाया जाता है। उत्तर प्रदेश में, जहाँ धार्मिक भावनाएँ प्रबल हैं, यह प्रभाव और गहरा है। आरएसएस इस स्थिति का लाभ उठाकर अपनी विचारधारा को मजबूत करता है और बहुजन वर्ग को उनके अधिकारों से दूर रखता है।

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की खराब स्थिति, माइक्रो फाइनेंस का जाल, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ और पौष्टिक भोजन की कमी जैसी चुनौतियाँ आपस में गहरे रूप से जुड़ी हुई हैं। ये सभी समस्याएँ मिलकर बहुजन वर्ग को गरीबी, अशिक्षा और अस्वास्थ्य के चक्र में फँसाए रखती हैं। जिससे स्पष्ट है कि आरएसएस और मनुवाद की विचारधारा इस स्थिति को बढ़ावा दे रही है, ताकि बहुजन वर्ग कमजोर और निर्भर बना रहे। इस साजिश से बाहर निकलने के लिए बहुजन वर्ग को जागरूक होना होगा। शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को मजबूत करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए और इस चक्र को तोड़ने के लिए संगठित होना चाहिए। जागरूकता और संघर्ष ही बहुजन वर्ग को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जा सकता है।

✍️ मनोज मानव की कलम से…

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